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VOL. 2, ISSUE 2 (2017)
प्रतिनिधि हिन्दी उपन्यास : बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद के परिप्रेक्ष्य में
Authors
Dr. Reetu Rani
Abstract
भूमण्डलीकरण के इस दौर में जीवन के हर क्षेत्र में नैतिकता का ह्नास हो रहा है और सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ईमानदारी जैसे शाश्वत मूल्य हाशिए पर ढ़केल दिए गए है। भूमण्डलीकरण का एकमात्र पुरूषार्थ है- ‘अर्थ’ और एकमात्र धर्म या नैतिकता है - ‘मुनाफा’। बाजारवाद व उपभोक्तावाद मानवतावाद के सर्वथा प्रतिकूल है। भूमण्डलीकरण का बाजारतंत्र है जो बाजार की आवश्यकता देखता है, मुनाफे के लिए कुछ भी करता है। समाज में आपसी लेन-देन एवं आदान-प्रदान के लिए एक बाजार जरूरी है। लेकिन आज इस बाजार में संवेदना और मूल्य की जगह माल, मुद्रा आदि ने ले ली है, यानि हमारे सामने और बीच भी व्यावसायिकता रह गई है। आज का मानव व्यावसायिकता के समुद्र में भोगवृत्ति और भोगवाद के सहारे अब डूब रहा है। मानवीय मूल्य पहले ही डूब चुके हैं, उसकी संवेदनशीलता तो रसातल में जा चुकी है। इन सभी स्थितियों का प्रभावशाली अंकन प्रस्तुत शोध-पत्र में किया गया है।
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Pages:275-277
How to cite this article:
Dr. Reetu Rani "प्रतिनिधि हिन्दी उपन्यास : बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद के परिप्रेक्ष्य में". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 2, Issue 2, 2017, Pages 275-277
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