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VOL. 5, ISSUE 2 (2020)
शैल्पिक वैशिष्ट्य के धरातल पर नयी कविता
Authors
सुनीता मिश्रा
Abstract
आधुनिक हिंदी कविता भारतेंदु युग से चलकर द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद जैसे कई पड़ावों को पार करती हुई नई कविता के धरातल पर पहुंची। इन सभी युगों में कविता अलग दृष्टि व संवेदना से जुड़ी है,अर्थात हर युग की अपनी- अपनी काव्य दृष्टि रही है। नई कविता सतत विकास की एक रूपरेखा भी स्पष्ट करती है। परिवर्तन की परंपरा के इतिहास में नई कविता की अपनी एक अलग पहचान है,उसका अपना एक महत्व है।
नई कविता ने परंपरा से रस तो ग्रहण किया किंतु उसकी अनुगामी या पुजारी नहीं बनी, अपितु प्रबुद्ध चेतना द्वारा युग की पीठिका पर प्रयोग करके आगे बढ़ने व जीवन मूल्य प्राप्त करने में विश्वास रखती अपना स्वयं का दृष्टिबोध लेकर नितांत संवेदनशील, बौद्धिकता,समसामयिकता, आधुनिक बोध, परिवेशगत यथार्थ और लेखक के अनुभूति से अटूट रिश्ता रखती नई कविता आधुनिक हिंदी काव्य धारा में अपनी एक अलग व विशिष्ट पहचान बनाने में समर्थ रही है। नई कविता व्यष्टि से होते हुए समष्टि तक विभिन्न संवेदनात्मक बिंदुओं को अत्यंत सूक्ष्म रूप से छूते हुए पहुंचती है। नई कविता हिंदी साहित्य के आधुनिक समय में रचे गए काव्य में संवेदना, शिल्प और वैचारिक धरातल पर एक ऐसी उपलब्धि है जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
1950-51 के बाद जिस नई कविता का सृजन हुआ वह आधुनिक दृष्टिकोण की उदारता को और भावबोध की व्यापकता को लेकर आई। इसका भवबोध किसी भी प्रकार की रूढ़ि से कुंठित नहीं है। इसीलिए यह आशा-निराशा, निर्माण-विध्वंस, सुंदर-असुंदर,आस्था-अनास्ता आदि सभी भावों, संवेदनाओं को लेकर चलती है। यह मनुष्य के देवत्व से नहीं अपितु उसके मनुष्यत्व से परिचित कराती है। वह बताती है कि ‘हर आदमी में देवता है और हर देवतापन हमको नपुंसक बनता है।’
(जो बंधनहीं सका, गरजा कुमार माथुर)
“नई कविता के विषय में डॉक्टर राजकुमार का कथन है मैं यह बौद्धिक चिंता ना वैज्ञानिक विश्लेषण सतत विकासशील दृष्टि प्रयोगशीलता रकात्मक तटस्थता आदि से संपन्न एक संस्कार परवाह है एक दिशा प्रक्रिया है मूल्य या तथ्य नहीं बल्कि एक भाव धार हैदृ।”
(नई कविता में मिथक, डॉ राजकुमार)
शैल्पिक दृष्टि से भी नई कविता प्रयोगधर्मी नई दृष्टि के साथ आई । उसने शैल्पिक धरातल पर युगानुरूप क्रांतिकारी परिवर्तन करके शिल्प के कई नए प्रतिमान स्थापित किए। भाषा,शब्द, प्रतीक, बिम्ब, उपमान- योजना, छंद, काव्य रूप आदि सभी धरातलों पर भिन्नता को लेकर नवीन शिल्प,नवीन विधान के साथ आगे बढ़ी। इसकी भाषा रश्मि तानों-बानों से नहीं अपितु यथार्थ के मोटे खुरदुरे धागों से बुनी गई है। वह सामान्य बोलचाल के निकट होकर भी कलात्मक और बिंबात्मक है। इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके शब्द, प्रतीक,उपमान,बिम्ब आदि विविध क्षेत्रों से लिए गए हैं जो नवीन अर्थवत्ता से युक्त सर्वथा नवीन है।छंद विधान की दृष्टि से नई कविता परंपरा से अलग हटकर मुक्त भूमि पर खड़ी है।
इस तरह नई कविता तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैज्ञानिकता व विवेक की नई भूमि पर नए भाव व दृष्टिबोध के साथ खड़ी हुई और उसने हिंदी कविता में अपनी एक अलग पहचान बनाई। साथ ही साथ नई कविता ने लोकजीवन के बिंबो, प्रतीकों ,शब्दों और उपमानों को लोकजीवन के ही बीच से चुनकर अपने को अत्यधिक संवेदनापूर्ण तथा सजीव बनाया। वह अपनी अन्तर्लय बिंबात्मकता, नवीन प्रतीक-योजना,नवीन विशेषणों के प्रयोग, नवीन उपमानों से ओत-प्रोत होकर आधुनिक हिंदी कविता के जगत में कदम रखती है और मजबूती से अपने पैर जमाकर अपने महत्व को कायम करती है।
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Pages:43-45
How to cite this article:
सुनीता मिश्रा "शैल्पिक वैशिष्ट्य के धरातल पर नयी कविता". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 5, Issue 2, 2020, Pages 43-45
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