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VOL. 6, ISSUE 1 (2021)
सामाजिक समरसता और जायसी
Authors
सुनीता मिश्रा
Abstract
समरसता अर्थात ऐसी समानता जहाँ किसी भी प्रकार की भिन्नता ना हो। सम यानि समानता। किसी भी देश की उन्नति का मूल आधार यदि सामाजिक समरसता को माने तो इसमें कोई अतिश्योक्ति न होगी क्योंकि सामाजिक समरसता का मूल उद्देश्य है एक समाज का दूसरे समाज के बीच भाईचारा, अपनत्व और सद्भावना का निर्माण करना यही सामाजिक एकता है और यही एकता विकास का मूल मन्त्र है। समाजिक समरसता को स्थापित करने हेतु धर्म, दर्शन, अध्यात्म व सांस्कृतिक समन्वय की भवना के पथ पर चलने की आवश्यकता होती है। हमारे देश के सामाजिक कर्मठ कार्यकर्ताओं, सच्चे धर्मगुरुओं,दर्शनशास्त्रियों एवं साहित्यकारों ने समय और परिस्थिति के अनुसार इस मार्ग का चयन किया और सामाजिक एकता को स्थापित करने का अथक प्रयास भी किया है। बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक, बहुदर्शन वाले हमारे देश को इस सन्मार्ग को समझने व उसपर चलने की अत्यंत आवश्यकता है इसे हम सभी ने महसूस किया है और इसी एहसास को जब समय की बदलती परिस्थितियों ने चोट पहुंचाने का प्रयास किया तब विद्वानों ने खासकर हमारे साहित्यकारों ने अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाकर देश की अखंडता को खंडित होने से बचाने की कोशिश की है। इस दृष्टि से मध्यकाल का भक्तिसाहित्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है जहाँ भक्त कवियों ने शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व, आत्मीयता, समन्वय, बंधुत्वभाव, तथा सर्वहित पर बल दिया और यही तो सामाजिक समरसता के मुख्य घटक हैं। किसी भी स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए स्वतंत्रता,बंधुता और समानता की आवश्यकता होती है और यह सामाजिक समरसता से सम्भव हो सकती है। हिंदी साहित्य के भक्त कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से मानव समाज को यही पाठ पढ़ाया है फिर चाहे सन्त कवि हों या सूफी कवि।
मलिकमुहम्मद जायसी हिंदी भक्ति साहित्य के ऐसे ही कवि हैं जिन्होंने अपने काव्य ने समन्वय के माध्यम से सांस्कृतिक व धार्मिक एकता को स्थापित किया जो उस समय के विकृत समाज के लिए बहुत जरूरी था। मुस्लिम दरबारी कवि होकर भी उन्होंने प्रचलित हिन्दू प्रेमकथाओं को अपने काव्य का विषय चुना और मुस्लिम संस्कृति के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने अपने महाकाव्य श्पद्मावतश् में सिंहलद्वीप की पद्मावती और चित्तौड़ के रत्नसेन की प्रेमकथा को आधार बनाकर हिन्दू संस्कृति का बहुत सुंदर चित्रण किया है। धर्म व दर्शन तथा अध्यात्म में भी जायसी ने समन्वय करते हुए हिन्दू देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों,परम्पराओं का चित्रण किया है साथ ही हठयोगियों,सहजयानियों, बौद्धों का अद्वैतवाद आदि का आध्यात्मिक दृष्टिकोण व दर्शन जायसी काव्य में मुस्लिम धर्म व दर्शन के साथ समन्वित हुआ है क्योंकि जायसी की नजर में सभी मनुष्य एक ईश्वर की संतान हैं,एक समान हैं चाहे वो किसी भी धर्म या जाति के हों सभी को साथ साथ रहकर प्रेम व सम्मान से समाज में जीने का हक है। कवि का यही भाव उसकी सामाजिक समरसता का परिचायक है।
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Pages:29-32
How to cite this article:
सुनीता मिश्रा "सामाजिक समरसता और जायसी". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 6, Issue 1, 2021, Pages 29-32
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