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VOL. 7, ISSUE 2 (2022)
साहित्य और समाज के बदलते प्रतिमान
Authors
पूनम रानी
Abstract
साहित्य और सामाजिक प्रतिमान का घनिष्ठ सम्बंध है, दोनों एक दूसरे के पूरक है। ये सामाजिक मूल्य ही है, जिसकी रक्षा और विस्तार का दायित्व साहित्य पर होता है। साहित्य सदियों से अपनी भूमिका का निर्वाह बखूबी करता आ रहा है, परन्तु आज के समाज में विद्वानों ने समाज की व्याख्या इतने दृष्टिकोणों से कर दी है, कि साहित्य अपनी विषय-वस्तु को लेकर भ्रमित होने लगा है। भ्रम का कारण यह नहीं कि विषय-वस्तु के साथ विच्छेद हो रहा है, अपितु किस विषय पर लिखा जाये जो समाज मूल्यों को स्पष्ट कर सके। मूल्यों का मूल्य इसीलिए होता है, कि समाज उसे स्वीकार करता है, और साहित्यकार उन्हीं मूल्यों पर अपना साहित्य गढ़ कर उसे आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर सके, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और आधुनिक तकनीकी युग ने मनुष्यों हेतु नये मूल्यों का सृजन किया है, जो धीरे-धीरे पुराने प्रतिमानों का स्थान लेते जा रहे है। अतः बदलते समाज के बदलते प्रतिमानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। हम सदैव प्रचलित प्रतिमानों के आधार पर ही समाज ही व्याख्या नहीं कर सकते, यह परिवर्तन ही है, जो हमें जीवित रखे हुये है, और हमारे समाज को जड़ता से बनाए हुये है, ऐसे में साहित्यकारों की जिम्मेदारी समाज विद्वानों के समान्तर हो जाती है, बदलते युग में साहित्यकार अपनी लेखनी से नये सामाजिक प्रतिमानों को गढ़ सकते है, हालांकि ऐसे प्रयास राजेन्द्र प्रसाद द्वारा रचित ’’एक दुनियांरू समान्तर’’ कहानी संग्रह में देखने को मिलता है, परन्तु पूर्ण नहीं अभी निरन्तर शोध की आवश्यकता है, ताकि आधार स्तम्भ के रूप में स्थापित प्रतिमान साहित्य और समाज को दिशा निर्देशित कर सके।
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Pages:27-30
How to cite this article:
पूनम रानी "साहित्य और समाज के बदलते प्रतिमान". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 7, Issue 2, 2022, Pages 27-30
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