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VOL. 8, ISSUE 1 (2023)
वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे भाषाई अस्मिता का प्रश्न
Authors
आशुतोष कुमार
Abstract
भारत की विविधता का वर्णन प्रोफेसर आशुतोष वार्षणय ने “मेलटींग पॉट“ की तरह ना कर “सलाद बॉउल” की तरह की है, ये वर्णन भारतीय विविधता को विशिष्ट पहचान देती है। भाषाई विवधता इन्ही मे से एक है जो वर्तमान राजनीति मे एक शक्ति के रूप मे प्रतिबिंबित होती है, फलस्वरूप भाषा एक मात्र संचार संवाद का साधन ना रह वैश्विक राजनीति का भी एक केन्द्रीय विंदु बन जाता है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी के संदर्भ मे लिखे है की “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल । बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। । निज भाषा के रूप मे हिन्दी तथा विभिन्न बोलियों पर की जा रही राजनीति भी इस आलेख मे वर्णित है। भाषा के सृजनात्मक शक्ति के कारण भाषा के महत्व विशेष हो गया है इसलीय भाषा राजनीति का केन्द्रीय तत्व बन गया है। भाषा की प्राथमिकता मे कुछ ही भाषा को उच्च स्थान दिया जाता है जिससे विभिन्न बोलियों की अस्मिता संकट मे आ जाती है तथा यह सामाजिक पदसोपनीयता का मार्ग भी प्रशस्त करती है । भाषा का प्रश्न वैश्विक राजनीति मे भी अमित छाप छोड़ रहा है। अतः भाषा की व्यापकता, इसकी गूढ़ता तथा अस्मिता हेतु समवेशिक राजनीति अत्यंत आवश्यक है ताकि सबका साथ और सबका विश्वास की संकल्पना चरितार्थ हो ।
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Pages:44-47
How to cite this article:
आशुतोष कुमार "वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे भाषाई अस्मिता का प्रश्न". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 8, Issue 1, 2023, Pages 44-47
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