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VOL. 8, ISSUE 2 (2023)
भारत में विमुद्रीकरणः वरदान या अभिशाप
Authors
नीलिमा, बृजलता शर्मा
Abstract
नोटबंदी/नोटबदली/विमुद्रीकरण नीति का भारतीयों के सामाजिक- सांस्कृतिक- राजनीतिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर संक्षिप्त परिचय 
देश के सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक ताने-बाने और राष्ट्रीय गतिशीलता पर इसके असाधारण प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करे तो पाएंगे कि नवंबर 2016 में, भारत सरकार ने भ्रष्टाचार का मुकाबला करने, काले धन को खत्म करने और नकली मुद्रा के संचलन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उच्च-मूल्य वाले करेंसी नोटों को विमुद्रीकृत करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। इस कठोर कदम के व्यापक परिणाम हुए जिसने भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
भारत में विमुद्रीकरण के इस ऐतिहासिक निर्णय लेने से लाखों नागरिकों के दैनिक जीवन को बाधित कर दिया था। विमुद्रीकरण नीति के क्रियान्वयन से तत्काल परिणामस्वरूप पूरे देश में देखे गए अराजक दृश्यों का वर्णन करना; वो भी निर्धारित शब्द सीमा में बहुत कठिनाई भरा कार्य है। इस नियम के चलते लोग सीमित समय सीमा के भीतर अपने पुराने नोटों को बदलने के लिए दौड़ पड़े। वित्तीय उथल-पुथल की इस अवधि के दौरान सामान्य आबादी द्वारा अनुभव किए गए तनाव और चिंता को उजागर करते हुए, सामाजिक संपर्क, पारिवारिक गतिशीलता और व्यक्तिगत व्यवहार पर प्रभावी अंकुश की स्थिति समाज में व्याप्त हो गई थी।
भारत में विमुद्रीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों जैसे शादियों, धार्मिक प्रसाद और अनौपचारिक क्षेत्र की गतिविधियों सहित भारतीय समाज के ताने-बाने में गहराई से शामिल नकद लेन-देन की पारंपरिक प्रथाओं की जांच करते हुए, नकदी की अचानक अनुपलब्धता के कारण हुए व्यवधान तथा यह पता लगाने के लिए कि व्यक्तियों और समुदायों ने वैकल्पिक भुगतान विधियों और डिजिटल लेन-देन को कैसे अपनाया। उन दिनों में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव जो भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक परिदृश्य का सदैव से एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रस्तुत लेख समग्र रूप से राष्ट्र की धारणा पर विमुद्रीकरण के प्रभाव की पड़ताल करते हुए इस नीति के प्रति भारत की जनता की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करने वाले सभी तत्वों; जिसमें जनता की भावना, विरोध और सरकार की पहल के लिए समर्थन आदि अभिव्यक्ति को आधार बनाकर विचार-विमर्श को शामिल किया गया है। इस लेख द्वारा इस बात की पड़ताल करने में पाठकों को मदद मिलेगी कि कैसे विमुद्रीकरण राजनीतिक बहसों, मीडिया आख्यानों और सार्वजनिक विमर्श में चर्चा का एक प्रमुख विषय बन गया, जिसने उस अवधि के दौरान राष्ट्रीय आख्यान को भी एक आकार दिया।
यहॉं इस शोध पत्र के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक संकेतो पर विमुद्रीकरण के दीर्घकालिक परिणामों की जांच पर भलि-भांति प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। यहां इस आकलन से पता चलता है कि नीति ने भ्रष्टाचार को रोकने, अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के अपने उद्देश्यों को किस हद तक सफलता प्राप्त की है। भारत के वित्तीय परिदृश्य में विमुद्रीकरण द्वारा लाए गए परिवर्तनकारी परिवर्तनों को उजागर करते हुए, वित्तीय समावेशन, तकनीकी अपनाने और फिनटेक स्टार्टअप्स के उदय पर प्रभाव का भी विश्लेषण किया गया है।
यह व्यापक योजना, प्रभावी संचार और समाज के कमजोर वर्गों पर प्रतिकूल प्रभावों के शमन की आवश्यकता पर बल देता है। यह लेख भारत में व्यापक वित्तीय सुधारों के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में विमुद्रीकरण की भूमिका की भी पड़ताल करता है, जैसे कि माल और सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत करके कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर धकेलना।
अतः हम यहां इसी उद्देश्य से विचार कर रहे हैं कि भारतीय समाज, संस्कृति और राष्ट्रीय गतिशीलता पर विमुद्रीकरण के असाधारण प्रभाव का गहन विश्लेषण क्या है। इस नीति के कारण हुए अभूतपूर्व व्यवधान की जांच करके, इसका उद्देश्य भारत के हाल के इतिहास में इस परिवर्तनकारी घटना के सामाजिक और सांस्कृतिक निहितार्थों को समझने में रुचि रखने वाले नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और व्यक्तियों के लिए समझ को बढ़ाना और अंतदृष्टि उत्पन्न करना ही, इस शोध पत्र का आधार है।

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Pages:153-159
How to cite this article:
नीलिमा, बृजलता शर्मा "भारत में विमुद्रीकरणः वरदान या अभिशाप". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 8, Issue 2, 2023, Pages 153-159
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