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VOL. 8, ISSUE 2 (2023)
राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश के उपन्यासों में सामाजिक चेतना
Authors
अनुपम कुमारी
Abstract
साहित्य का केन्द्र समाज होता है और समाज का केन्द्र मानव होता है। हिन्दी गद्य साहित्य की विविध विधाओं में उपन्यास सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, जिसमें मानव और उसके जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण होता है। परिवर्त्तनशील मानव जीवन मंे उपन्यास काफी प्रभावशाली रहा है। स्वातंत्र्योत्तर उपन्यासों में सामाजिक चेतना की वैविध्यपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है।
उपन्यासकारों ने मानव मन को टटोलते हुए,एक-एक परत को सुक्ष्म रूप से देखने की कोशिश की है और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिन उपन्यासकारों या कथाकारों का विशेष नाम है- उनमें से राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश प्रमुख है। इन्होंने समाज को नयी दृष्टि से देखा है। शिल्प की दृष्टि से उनके प्रयोग किए है। राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश समाज के प्रति बड़े जागरूक थे। यादव जी और राकेश जी ने उन परिस्थितियों और विश्वासों पर प्रहार किया है जो पुरानी लकीर को खींचने के फेर में जीवन यथार्थ का सामना करने में असमर्थ है।
संसार परिवर्तनशील है तथा स्थिरता जड़ता का चिन्ह है। प्रत्येक युग के अपने मूल्य होते हैं, युग बदलने के साथ ही ये मूल्य भी बदल जाते है और उनके स्थान पर समाज में नवीन चेतना आती हैं।
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Pages:181-184
How to cite this article:
अनुपम कुमारी "राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश के उपन्यासों में सामाजिक चेतना". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 8, Issue 2, 2023, Pages 181-184
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