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VOL. 9, ISSUE 2 (2024)
मार्क्सवादी राजनितिक चेतना के उपन्यासकार भैरव प्रसाद गुप्त
Authors
डॉ. अखिलेश त्रिपाठी
Abstract
भैरव प्रसाद गुप्त स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासकारों में एक ऐसा नाम है जो परिपूर्ण रूप से कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद से अनुप्राणित है। वैज्ञानिक समाजवादी का दर्शन का विचार ’’सती मैया का चौरा’’ ’’गंगा मैया’’, धरती, अंतिम अध्याय, नौजवान आदि कालजयी उपन्यासों के साथ अब तक 200 से अधिक क हानियों चाय का ’’याला, हड़ताल, धनिया की साड़ी, मंगल की टुकड़ी, लोहे की दीवार, एक खामोश मौत, श्रम, आप क्या कर रहे हैं, हकीम कौन है, यही जिंदगी है, चुपचाप, घुरहुआ, कदम के नीचे, हनुमान, सोने का पिंजरा में भी देखा जा सकता है। भैरव प्रसाद गुप्त को भारतीय गणराज्य के उत्तर प्रदेश के राज्य के पूर्वी अंचल की सामाजिक संरचना की गहन समझती थी। भैरव प्रसाद गुप्त सांप्रदायिकता के विरुद्ध तथा वर्ग संघर्ष के हिमायती थे। मार्क्सवाद में भारत की समस्याओं का समाधान भैरव प्रसाद गुप्त जी देखते थे। भैरव प्रसाद गुप्त का संपूर्ण साहित्य वैज्ञानिक समाजवाद पर अवलंबित है। भैरव प्रसाद गुप्त वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज की परिकल्पना अपने उपन्यासों में करते हैं।
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Pages:60-62
How to cite this article:
डॉ. अखिलेश त्रिपाठी "मार्क्सवादी राजनितिक चेतना के उपन्यासकार भैरव प्रसाद गुप्त". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 9, Issue 2, 2024, Pages 60-62
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