ARCHIVES
VOL. 10, ISSUE 2 (2025)
प्राचीन काल से आधुनिक काल तक न्याय व्यवस्था का विवेचनात्मक अध्ययन
Authors
इशिता सिंह
Abstract
राष्ट्र के विविध सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास भारतीय न्याय व्यवस्था के लंबे और जटिल इतिहास में परिलक्षित होते हैं। भारत की न्यायपालिका ने अपने रीति-रिवाजों से प्राप्त कुछ शाश्वत विशेषताओं को बरकरार रखते हुए प्राचीन काल से वर्तमान तक जबरदस्त बदलाव का अनुभव किया है। प्रस्तुत शोध आलेख का उद्देश्य यह जांचना है कि भारत की न्यायिक प्रणाली कैसे विकसित हुई, इसकी जड़ों को पुरातन रीति-रिवाजों से लेकर वर्तमान कानूनी प्रणाली तक और उस समय हुए परिवर्तनों, निरंतरताओं और सुधारों को देखना। प्राचीन भारत में, प्रथागत नियम और समुदाय-आधारित संस्थाएँ न्याय प्रशासन के मुख्य साधन थे। उदाहरण के लिए, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति धर्मशास्त्र में महत्वपूर्ण लेखन थे जिन्होंने नैतिक और कानूनी मानकों को स्थापित किया। स्थानीय ग्राम सभाएँ (सभा और समितियाँ), विद्वान ब्राह्मणों की परिषद और मंत्री सभी राजा (राजा) का समर्थन करते थे, जिन्हें न्याय प्रशासन में अंतिम अधिकारी के रूप में देखा जाता था। स्थानीय संघर्ष समाधान प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने के लिए, कानूनी विवादों को अक्सर परिवार या समुदाय के स्तर पर सुलझाया जाता था। 1950 में जब भारत ने स्वतंत्रता के बाद एक लोकतांत्रिक संविधान लागू की गयी, तब एक एकीकृत और स्वतंत्र न्यायालय की स्थापना की गई। राज्य-स्तरीय उच्च न्यायालयों और उनके अधीन निचली अदालतों के साथ, भारत का सर्वाेच्च न्यायालय सर्वाेच्च संवैधानिक न्यायालय के रूप में स्थापित हुआ। न्यायिक समीक्षा भारतीय अदालत को बुनियादी अधिकारों को संरक्षित करने और संविधान की सर्वाेच्चता को बनाए रखने का अधिकार देती है। प्रस्तुत शोध आलेख में प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था से वर्तमान समकालीन न्याय व्यवस्था का एक विवेचनात्मक अध्ययन किया गया है।
Download
Pages:28-30
How to cite this article:
इशिता सिंह "प्राचीन काल से आधुनिक काल तक न्याय व्यवस्था का विवेचनात्मक अध्ययन". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 10, Issue 2, 2025, Pages 28-30
Pdf, Certificate, Cover Page, Index Page, Editorial Page, Accept Letter
Please enter the email address corresponding to this article submission.
