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VOL. 11, ISSUE 1 (2026)
कक्षा शिक्षण में शिक्षक की आत्म-प्रभावकारिता की भूमिका
Authors
डॉ. पारुल मलिक, सपना
Abstract
शिक्षकों की प्रभावशीलता कई बातों पर निर्भर करती है और आत्म-प्रभावकारिता उनमें से एक है। आत्म-प्रभावकारिता की अवधारणा मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा ने अपने सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत में दी थी। आत्म-प्रभावकारिता का मतलब है किसी व्यक्ति का अपनी क्षमताओं के बारे में विश्वास कि वह खास कामों को पूरा कर सकता है। जिन शिक्षकों को अपनी पढ़ाने की क्षमताओं पर ज़्यादा विश्वास होता है, वे ऊँचे लक्ष्य हासिल करते हैं, जबकि जिन शिक्षकों को अपनी क्षमताओं पर कम विश्वास होता है, वे असफलताओं के डर के साये में रहते हैं। पिछले चार दशकों में, शोधकर्ताओं ने शिक्षण और सीखने में शिक्षकों की आत्म-प्रभावकारिता पर प्रकाश डाला है और इसे एक महत्वपूर्ण प्रभावी अवधारणा के रूप में स्थापित किया है। आत्म-प्रभावकारिता शिक्षकों के लिए अपने लक्ष्यों, कार्यों को पूरा करने और वे निर्देशात्मक चुनौतियों का सामना कैसे करते हैं, इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कम आत्म-प्रभावकारिता वाले शिक्षक चुनौतीपूर्ण गतिविधियों से बचते हैं, रचनात्मक गतिविधियों और स्थितियों को मुश्किल मानते हैं, ज़्यादातर चीज़ों को नकारात्मक रूप से लेते हैं और अपनी क्षमताओं पर विश्वास खो देते हैं, जबकि उच्च आत्म-प्रभावकारिता वाले शिक्षक चुनौतीपूर्ण गतिविधियों का स्वागत करते हैं, अपनी गतिविधियों में गहरी रुचि पैदा करते हैं, प्रतिबद्धता की उच्च भावना विकसित करते हैं और असफलताओं से तेज़ी से उबरते हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य शिक्षकों की आत्म-प्रभाविता की अवधारणा और शिक्षकों की प्रभावशीलता में इसके महत्व की समीक्षा करना है।
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Pages:68-71
How to cite this article:
डॉ. पारुल मलिक, सपना "कक्षा शिक्षण में शिक्षक की आत्म-प्रभावकारिता की भूमिका". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 11, Issue 1, 2026, Pages 68-71
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