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VOL. 8, ISSUE 2 (2023)
स्त्री अस्मिता संघर्ष और जिजीविषा का सशक्त रूप-छिन्नमस्ता
Authors
सुशीला बाई, कविता भाटिया मेहता
Abstract
प्रभा खेतान बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक की बहुचर्चित उपन्यास लेखिका है। आज हमारा युगबोध बदल गया है, जीवन पद्धतियाँ बदल गयी है। इसलिए स्त्री-पुरुष संबंधों में समीकरण की तलाश है। हिंदी साहित्य के आरम्भिक काल की रचनाओं में स्त्री को केवल विलासिता का पर्याय माना गया है। लेकिन आधुनिक काल में हिंदी साहित्य में नारी-लेखन आने के बाद नारी साहित्य का विषय बना। स्त्री सशक्तिकरण का सबसे बुलन्द नारा है साहित्य में स्त्री अस्मिता का प्रभाव। आधुनिक युग के उपन्यासों में दिखाई देने वाली एक नयी समस्या है- अस्मिता का बोध। अस्मिता माने अपनी सत्ता की पहचान। स्त्री-विमर्श की प्रखर चिन्तक और उपन्यासकार प्रभा खेतान का चर्चित उपन्यास है ‘छिन्नमस्ता’ इस उपन्यास में एक ऐसी स्त्री का जीवन संघर्ष है जो पुरुष-प्रधान समाज में पुरुषों के वर्चस्व के विरूद्ध अपनी अलग पहचान और जमीन बनाना चाहती है। पुरुष ने मानसिक और शारीरिक इन दोनों स्तरों पर स्त्री का निरन्तर शोषण किया है। ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास की नायिका प्रिया इन दोनों मोर्चों पर पुरुष के शोषण से मुक्त होना चाहती है। प्रभा खेतान की नायिका प्रिया अपने आत्मविष्वास और परिश्रम के कारण वह समाज में अपनी पहचान बनाने में सफल होती है। आत्मनिर्णय और नए संकल्पों से निर्मित यह नारी पात्र नये नारीवाद का एक प्रतीक है। इस उपन्यास के सभी स्त्री पात्र स्त्री अस्मिता के अटूट उदाहरण है।
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Pages:170-172
How to cite this article:
सुशीला बाई, कविता भाटिया मेहता "स्त्री अस्मिता संघर्ष और जिजीविषा का सशक्त रूप-छिन्नमस्ता". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 8, Issue 2, 2023, Pages 170-172
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