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VOL. 8, ISSUE 2 (2023)
हिंदी साहित्य में पर्यावरण विमर्श
Authors
कविता तुकाराम चानकने
Abstract
मनुष्य और पर्यावरण के घटकों से गहरा नाता है। प्रत्येक मनुष्य जीव पर्यावरण के साथ जुड़ा हुआ है और मृत्यु के बाद पर्यावरण में समाहित हो जाता है। पर्यावरणीय शिक्षा से भावी पिढी के हृदय में पर्यावरणीय जागरूकता, प्रेमभाव और उसे सुरक्षित रखने के लिए सजगता  का भाव उत्पन्न कर सके। पर्यावरण  सुरक्षा लिए रचनात्मक सहभागिता को ओर आकर्षित कर सकते हैं।  पर्यावरण  के साथ शिक्षा का सहसंबध  समझने के लिए उससे सबंधित साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है। कमलेश्वर जी के उपन्यासों में नैतिक मूल्यों और आदर्शों एवं आधुनिक व्यवहारिक मूल्यों के बीच की टकराहट उनसे उत्पन्न संघर्ष तथा तनाव का चित्रण  सूक्ष्मता से किया हैं। उन्होंने केवल वर्तमान जीवन की पीड़ाओं, संघर्षों को अपने साहित्य में अभिव्यक्त नहीं किया बल्कि उनके खिलाफ़ आवाज उठाने की प्रेरणा भी दी है। 
उपन्यास के कथानक में स्वतंत्रता के बाद विलानीकरण निती के कारण राजघरानों एकाधिकारशाही की नींव हिलने लगी। राजशाही और लोकतान्त्रिक मूल्यों में संघर्ष उत्पन्न होने लगा। राजशाही और सामंती घरानों की पर्यावरण के घटकों पर अपना अधिकार जताकर उसका इस्तेमाल अपनी राजशाही शान की आमदनी बढ़ाने का अपने मनोरंजन का साधन मान लिया था। दूसरी ओर महारानी राजलक्ष्मी तथा उनके संस्कारों की छवि समीरा दोनों के मन में प्रकृति तथा पछियों के प्रति अनन्य प्रेम दिखाई देता है। राजशाही घरानों की महारानी और राजकुमारी पक्षियों रक्षण और प्रकृति के पशु और प्राणियों को बचाने का प्रयास करते हैं। कथानक में एक ओर सामंती राजशाही व्यवस्था को बचाने के लिए पर्यावरण को खतरे में डाला जा रहा है; वही दूसरी ओर पर्यावरण बचाने के लिए जीवन को समर्पित किया जा रहा है, इनके संघर्ष को उपन्यास “अनबीता व्यतीत” में चित्रित किया गया है।
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Pages:179-180
How to cite this article:
कविता तुकाराम चानकने "हिंदी साहित्य में पर्यावरण विमर्श". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 8, Issue 2, 2023, Pages 179-180
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