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VOL. 9, ISSUE 3 (2024)
लोकसुक्ति का सैद्धांतिक स्वरूप एवं विशेषताओं का सांस्कृतिक मूल्यांकन
Authors
महासिंह पूनिया
Abstract
लोकसुक्ति लोक में प्रचलित पुष्टिपरक ऐसे ब्रह्म वाक्य हैं जिनमें सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए अनुभव शामिल हैं। वास्तव में लोकोक्ति, कहावत, ग्रामोक्ति तथा लोकसुक्ति अलग-अलग विधाएं हैं। इन विधाओं पर अभी तक शोध नहीं हुआ है। सभी विधाएं एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं किंतु सैद्धांतिक स्वरूप की दृष्टि से सभी विधाएं एक-दूसरे से अलग हैं। लोकसुक्ति एक ऐसी विधा है जिसमें उपदेश के साथ-साथ पूरकता एवं संक्षिप्तता भी समाहित होती है। इसके अंतर्गत अनेक विशेषताएं समाहित होती हैं। जिनमें नैतिकता, उपदेशात्मकता, विस्मयता, प्रश्नात्मकता, आश्चर्यजनकता, सारगर्भिता, संक्षिप्तता, कौतुहलता, रोचकता, संदेशात्मकता, शिक्षात्मकता, मनोरंजनात्मकता, तुकांतता, लोकानुभवता, लोकमर्मज्ञता, औत्सुक्यता, अनुभवशीलता, प्रासंगीकता आदि शामिल हैं। इस प्रकार लोकसुक्तियां सांस्कृतिक दृष्टि से समाज में बिखरे हुए वे ज्ञानात्मक मोती हैं जिनको एक माला में पिरोकर नैतिकता एवं उपदेशात्मकता का संदेश जनमानस को दिया जा सकता है। इस शोधपत्र में लोकसुक्ति की परिभाषा, स्वरूप, विशेषताएं एवं सांस्कृतिक मूल्यांकन को प्रस्तुत कर इसकी सार्थकता को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है।
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Pages:41-44
How to cite this article:
महासिंह पूनिया "लोकसुक्ति का सैद्धांतिक स्वरूप एवं विशेषताओं का सांस्कृतिक मूल्यांकन". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 9, Issue 3, 2024, Pages 41-44
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